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गोनूझाक पटौनी

लेखक: गोनू झा
⏱ 5 मिनट पाठ 👁 1 बेर पढ़ल गेल 📜 लिपि: Devanagari
टैग / विषय: #गोनू झा #लोकगाथा #हास्य-व्यंग्य #चतुराई #नीति-कथा
📖 पुस्तक / संग्रहक अंग

गोनू झाक हास्य लोकगाथा • अध्याय 19

📚 सम्पूर्ण अनुक्रमणिका (Contents)
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गोनू झा खेती-पथारी सँ कम्मे मतलब राखथि । अधिकांश समय राज दरबार मे बीतैन । तथापि जे किछु पुरखा लोकनिक छोड़ल खेत रहनि ताहि पर खेती-बाड़ी करथि । ओहो खेत सभ अल्पे मात्रा मे रहनि आ जे रहैन से प्राय: घरे लग रहैन । एकबेर किछु गोटाक कहला पर ओ घर लगहक खेत मे गहूम बाग कऽ देलनि । बाग करबाक समय मे हाल रहैक आ तें जल्दीये गहूमक खेत भरि गेलैक । तथापि जेना कि अपेक्षित छल किछु मासक बाद एकरा पटायब जरुरी भऽ गेलैक । तथापि लग मे पटेबाक एक मात्र साधन हुनक इनार रहनि । ओ गाम मे जोनक वास्ते घूमय लगलाह जे कियो उचित बोनि लऽ कऽ हमर गहूम पटा देत । मुदा जखने कियो इनार सँ पानि घीचि के पटेबाक बात सुनै तँ ओ मना कऽ दैन । आब गोनू पड़लाह बेस फेर मे । पटौनीक बिना गहूमक पौध सभ मुरझाय लगलैक । एमहर चोर सभ गोनू सँ अपन बेर-बेर ठकेबाक बदला लेबाक एहो योजना बनेलल । जहिना एकबेर गोनू चोर सभ कें छका अपन खेत तैयार करबेने रहथि किछु तेहने सन जोगारक फिराक मे गोनू रहय लगलाह । एमहर चोरो सभ फिराक मे रहय जे कोनो ने कोनो प्रकारे एक बेर गोनूक घर मे चोरि करबाक मौका लागय । ओना धन प्राप्ति आश तँ रहबे करैक, सभ सँ बेसी चिन्ता रहैक गोनू सँ बेर-बेर भेल अपमानक बदला लेनाई । एहि बीच राज दरबार मे काजक अधिकताक कारणें गोनू कें घर अयबा मे कनेक अबेर भऽ जाईन । चोरो सभ ताहि मध्य अपन प्रोग्राम बनेलक । चूँकि ओ सभ राति आ सांझ मे जा कऽ छका चुकल छल आ तें एकटा अनुभवी चोर अभ्यागतक रूप मे सांझे गोनूक द्वारि पर पहुँच गेल । संजोग सँ गोनू ओहि दिन सबेरे घर आबि गेल रहथि । ओ चोर कोनो बाबाक रूप लेलक आ राति भरि गोनू कें अपना ओहिठाम ठहरय देबाक आग्रह केलक । ताहि समय मे अभ्यागतक आव-भगत होईत छल आ तें गोनू बाबाक आव-भगत मे लागि गेलाह । आँगन मे बाबाक आगमनक सूचना दऽ देल गेल । बाबा आ गोनू दुनू गोटे बैसि गेलाह नाना तरहक गप्प करय लेल । शनै:-शनै: गप्पक मुद्दा चोरीक समस्या पर आबि गेल जे आब केहेन जमाना आबि गेल अछि आ चोर सभक कारनामाक अणगिनत खिस्सा सभ बाबा गोनू कें सुनबय लगलाह । संगहि बाबा गप्पक क्रम मे गोनू द्वारा चोरि सँ बचबाक लेल कयल गेल इंतजामक विषय मे सेहो जानय चाहलनि । सतर्क गोनू कें ई बुझबा मे भांगठ नहि रहलनि जे ई कोनो बाबा नहि वरन्‌ साक्षात्‌ चोरे महोदय छथि । गोनू तँ एकरे ताक मे रहथि जे चोर सभ कें छका कोना गहूमक पटौनी कराओल जाय । संजोग सँ मौका सामने रहनि । गप्पक सिलसिला कें दोसर दिस मोड़ैत गोनू बाबा सँ सम्पत्ति आदिक सुरक्षाक की इंतजाम कयल जाय तकर जिज्ञासा केलनि आ संगहि प्रकट रूप सँ कहलनि जे हमरा घर मे सोना-चांदीक सिक्काक अंबार अछि, कारण रोज-रोज दरबार सँ भेटिते रहैत अछि । ताहि पर बाबा सलाह देलनि जे सोना-चाँदी आदि के बिनु ताला लगेने राखक चाही, कारण चोरक ध्यान पहिने ताला लागल सामान पर जाइत छैक । बाबाक मूँह सँ चोर सभक गप्प सूनि गोनू बेस चिंतित भेलाह आ भोजन सँ पहिने एकरा सुरक्षित स्थान पर रहबाक गप्प कहि ओ आँगन चलि गेलाह । आँगन मे जाईतहि ओ घर मे उपलब्ध दू-चारि टा सिक्का के बेर-बेर खनखनाय के गनलनि आ पुन: एकटा मोटरी मे झूटमूठ किछु बान्हि बाहर अयलाह आ ढ़प्प दऽ मोटरी घर लगहक इनार मे खसा देलनि । बाबा जिज्ञासा केलनि जे अपने ई की कयल? गोनू उत्तर देलनि जे जहन सँ अहाँ मूँह सँ चोर सभक खिस्सा सभ सुनलौं हम तँ आतंकित भऽ गेलौं । अपन सभटा सोना-चांदीक सिक्का मोटरी मे बान्हि एहि इनार मे खसा देलियैक आ आब निश्चिंत सँ सूतब । ने घर मे किछु रहत आ ने चोर लऽ जायत । चोर के की पता जे सभटा कीमती सामान एहि इनार मे अछि । ई कहैत गोनू झा अपन चेहरा पर बेस खुशीक भाव प्रकट केलनि आ संगहि बाबा कें उचित सलाह देबाक लेल धन्यवाद सेहो देलनि । ता भोजनक समय भेल । बाबाक संग गोनू भोजन केलनि आ चल गेलाह सूतय । एमहर बाबा दलान पर सूतलाह आ निशाभाग राति होईत देरी अपन संगी सभ के इशारा सँ बजाय सभटा गप्प कहि देलनि । फेर की छल । सभ चोर मीलि कें लागल इनार कें उपछय । शनै:-शनै: हुनक गहूमक खेत पाटय लगलनि । जहन इनार पूरा सुखा गेलैक तँ चोर सभ कें मोटरी भेटि गेलैक । ओ सभ यत्न सँ मोटरी कें निकालि लत्ते-पत्ते ओतय सँ पड़ा गेल । मोटरी निकलैत-निकलैत गोनूक खेत नीक जेना पाटि गेलनि । ओमहर चोर सभ अपन घर पहुँचल आ सभ मीलि कें मोटरी के खोललक । परन्तु ई की? एहि मे तँ एकोटा सिक्का नहि छल । चोर सभ फेर गोनूक हाथ सँ छका चुकल छल । ओ सभ अपन माथ पीटि कें रहि गेल । परन्तु आब पछतेला सँ की हो? समय हाथ सँ निकलि चुकल छल । भोर भऽ चुकल छल । एमहर राता-राती गोनूक गहूमक खेत पाटि जेबाक खबरि भोर होइत सौंसे गाम मे पसरि गेल । लोक कें ई बुझबा मे भांगठ नहि रहलैक जे गोनू कोना अपन खेत चोरबा सभ सँ पटबा लेलनि । पहिनहुँ तँ कयक बेर छकेने छ्लाह चोर कें गोनू झा ।
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गोनू झा

मिथिलाक जन-जनमे व्याप्त अमर विदूषक ओ प्रत्युत्पन्नमति पंडित। राजा शिवसिंहक समकालीन, हुनक चातुर्य कथा सर्वत्र विख्यात अछि।

व्यक्तित्व ओ रचनावली ➔

⚖ अनुज्ञप्ति, स्रोत एवं प्रामाणिकता (License, Provenance & Quality)

अनुज्ञप्ति: PUBLIC_DOMAIN — सार्वजनिक डोमेन (पारंपरिक लोककथा / लोकगाथा) • गुणवत्ता स्तर: समुदाय/परम्परा (Community/Heritage)

स्रोत विवरण / पाठ प्रामाणिकता: मूल मैथिली पाठ

मूल स्रोत (Original Source): https://hindikahani.hindi-kavita.com/Gonu-Jhak-Patauni-Maithili-Gonu-Jha.php

🎙️ वाचन / ऑडियो स्थिति: वाचन पाठ प्रत्याशी (Audio Recording Requested)

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