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खट्टर ककाक तरंग : 24. काव्य क रस

लेखक: हरिमोहन झा
(1948)
⏱ 20 मिनट पाठ 👁 1 बेर पढ़ल गेल 📜 लिपि: Devanagari
टैग / विषय: #हास्य-व्यंग्य #कथा #हरिमोहन झा #खट्टर काका #खट्टर ककाक तरंग
📖 पुस्तक / संग्रहक अंग

खट्टर ककाक तरंग • अध्याय 24

📚 सम्पूर्ण अनुक्रमणिका (Contents)
अक्षर (Size):
ओहिदिन खट्टर कका खाट घोरैत रहथि । हमरा संग में एक व्यक्ति कैं देखि कऽ बजलाह – हौ, ई झुल्फी बला के छथिन्ह ? हम कहलिऎन्ह – ई कवि छथि । हमर सार थिकाह । अपन कविता अहाँ कैं सुनाबय चाहैत छथि । खट्टर कका बजलाह - आइ हमरा बैसि कऽ कविता सुनबाक फुरसति नहिअछि। हॅं, जौं तों रस्सी धरौने जाह और ई पौआ अलगौने जाथि त हम थोड़ेक सुनि लेबैन्ह । हम कहलिऎन्ह - बेस त , सैह रहौ । कविजी अपन 'प्रिया-मिलन' नामक प्रेमकाव्य प्रारम्भ कैलन्हि । किछु काल सुनलाक उपरान्त खट्टर कका कहलथिन्ह – औ,आब बंद करू । कविजी अकचका क पुछलथिन्ह - से किऎक ? खट्टर कका बजलाह – हमरा फूसि नहिं सुनल जाइ अछि ! कवि - हम फूसि की कहल अछि ? ख० – सभटा फूसिए कहल अछि । अहाँ कहैत छी जे चातक पक्षी स्वाती क बुन्द छोड़ि और कोनो पानि नहिं पिबैत अछि । अहाँ चातक कैं कहियों पानि पिया कऽ देखने छिऎक ? कवि - नहिं । ख० - परन्तु हम त चिड़ियाखाना में देखने छिऎक । ओ बारहो मास तीसो दिन पानि पिबैत अछि । कविजी चुप्प भऽ गेलाह । खट्टर कका पुनः कहलथिन्ह – औ कविजी ! अहाँ लिखै छी जे चकोर पक्षी अग्नि-भक्षण कय पचा लैत अछि । अहाँ कहियो चकोर कैं अग्नि खोआ कय देखने छिऎक ? कविजी - नहिं । ख०-- तखन अहाँ कोना बुझैत छिऎक जे ओकर ठोर नहिं पकैत छैक ? कविजी चुप्प । ख०-- अहाँ लिखैत छी जे चकवा पक्षीक जोड़ा राति में एक संग रहिए नहिं सकैत अछि। परन्तु हम त एक्के पिजड़ा में नर – मादा दूनू कैं रहैत देखने छिऎ क । कविजी चुप्प । ख०-- अहाँ लिखने छी जे हंस नीर ओ क्षीर कैं पृथक कय दैत अछि। ई बात अहाँक देखल अछि ? यदि ई सत्य हो त हम आइए एकटा हंस पोसि ली। जैखन गोआरिन दूध लऽ कऽ आओत तैखन हंसक लोल ओहि में डुबा दे बैक । परन्तु यदि दूध और पानी फराक नहिं भेल , तखन ? कविजी चुप्प । खट्टर कक पुनः कहय लगलथिन्ह – औ कविजी ! अहाँ कहियो केरा सॅं कर्पूर बनैत देखलिऎक अछि? हाथीक माथ सॅं मुक्ता बहराइत देखलिऎक अछि ? कतहु पारस पाथर देखबा में आयल अछि । यदि वास्तव में ओ पाथर रहितैक त एहि देशक कवि हकन्न किएक कनितथि? लोहा में छुआ दितथिन्ह, सोना बनि जइतैन्ह । कवि पत्नी सोने क कड़ाही में दूध औटतथि । कविजी - परन्तु प्राचीन कवि सभ त एहिना लिखि गेल छथि । ख० - तदि ओ लोकनि लिखि गेल छथि जे नायिका कैं कटि नहिं होइ छैन्ह, तखन अहाँ अपना स्त्रीक करघनी फेकि देब ? हम पुछलिएन्ह - खट्टर कका, एहि सभ बातक परीक्षा कैनहि बिना लोक एतबा दिन सॅं किएक मानैत आबि रहल अछि ? खट्टर कका बिहुँसैत बजलाह – हौ, हमरा लोकनि छी मिथ्यानन्द । मिथ्याक कल्पना में हमरा सभ कैं बेसी आनन्द भेटैत अछि। 'सुन्दरीक लात सॅं अशोक वृक्ष फुला जाइछ' एहन एहन कल्पना कोनो वैज्ञानिक क मस्तिष्क मे आबि सकैत छैन्ह ? ` ` ` ` `औ कविजी, ओहि कातक पौआ अलगाउ । खट्टर कका खाट घोरैत कहय लगलाह- हौ, कवि लोकनि धन्य होइ छथि। हुनका सभ किछु माफ रहै छैन्ह। वैह बात जौं दोसर बाजय त मारि भऽ जाइक। हम- से कोना खट्टर कका? ख०- देखह। यदि किनको कहल जाइन्ह जे ' कन्या में अपूर्व लावण्य अछि' त पिताक मन प्रसन्न भऽ जैतैन्ह। परन्तु वैह बात यदि ठेठ शब्दें कहल जाइन्ह जे 'बेटी बड्ड नमकीन अछि' तखन लाठिए बजरि जाय। विचारि कऽ देखह, त बात एक्के! परन्तु कहबाक शैली में भेद छैक! यदि वैह बात गमार बजाय त लंठ भेल, कवि बजलाह त रसिक भेलाह। हम कहलिऎन्ह- खट्टर कका, ई त ठीक कहल। खट्टर कका खाट घोरैत बजलाह- हम कोनो बात बेठीक कहैत छिऔह? यदि कोनो युवती कैं केओ सोझे जा कऽ कहैन्ह-' वाह! अहाँक स्तन बड्ड सुन्दर अछि' त ओकरा पर पादुका बरसतैक। और यदि वैह बात छंद बना कऽ बजताह त हुनका पर पदक बरसतैन्ह की औ कविजी! अहीं जे नायिका क पयोधर कै एना खोलि कऽ वर्णन कैने छिऎक तेना कोनो वास्तविक बहु-बेटी कैं कहबैक ? खट्टर ककाक ई रबैया देखि कविजी रस्सीक फंदा छोड़ाय, अपन प्रेम-काव्य समेटैत घसकन्तौवाच भेलाह । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, आइ अहाँ कैं तेहन सूर चढि गेल जे बेचारे कविजी अपन सन मूँह लऽ कऽ बिदा भऽ गेलाह । खट्टर कका बजलाह – हौ, हमरा हाथ में रस्सीक घर्रा लगैत छल और कुच वर्णन सुनाबय लगलाह ! एही द्वारे हमरा तामस उठि गेल । परन्तु बलहुँ वेचारा कैं एतेक बात कहलिऎक एहि देशक त परम्परे यैह छैक । देखह - हम - एकर अर्थ की भेलैक ? ख० - कवि कहैत छथिन्ह - "हे बाले, अहाँक दूनू````` पहिने बैर सन सन छल; तखन धात्रीफल सन भेल ; तदुपरान्त अनार सन सन भऽ गेल; आब हाथी क माथ सॅं टक्कर लय रहल अछि ।" हम - खट्टर कका, ई त अश्लील भेल ! खट्टर कका व्यंग्यपूर्वक बजलाह – हँ । हम गद्य में अनुवाद क कहलिऔह त अश्लील भऽ गेल । और यैह बात कवि कोकिल पद्य में बजलाह त कोमल- कान्त- पदावली भऽ गेलैन्ह ! वैह बैर सॅं नारंगी, ओ नारंगी सॅं बेल ! परन्तु एहन एहन पद कैं केओ अश्लील नहिं कहैत छैन्ह । स्वयं युवतीगण गबैत छथि । सेहो बेस टहंकार सॅं । राग भास दऽ कऽ हम - खट्टर कका, विद्यापतिक कविता में केहन अपूर्व रस छैन्ह ? खट्टर कका बानि दैत बजलाह – हौ, एहिना संस्कृतक कवि लोकनि श्रृंगारक वर्णन में अपन चमत्कार देखौने छथि तहिना त ओहो कैने छथि । वैह नख सिख, वैह सद्यःस्नाता, वैह विरह, वैह अभिसार, वैह नखक्षत, वैह विपरीत रति। हमरा त कोनो नवीनता नहिं बुझि पड़ैत अछि । हम - तखन करोड़ो जनता हुनका कविता पर किऎक मुग्ध अछि ? खट्टर कका बजलाह - एकर कारण जे पहिने नायिका क संभोग वर्णन केवल संस्कृते काव्य में रहैत छलैक । साधारण लोक ओहि रस सॅं बंचित रहैत छल। देवभाषाक ओहि रस कैं ई लोकभाषा में लऽ अनलन्हि। फलस्वरूप सभ केओ ‘कुचकुचकटाक्ष' क आस्वादन करय लागि गेल। एहि माधुर्यक कारण विद्यापति ग्रामीण जनताक कंठहार बनि गेलाह। यदि हुनका पदावली सॅं 'कुच' काटि देल जाइन्ह त की रहि जैतैन्ह ? केवल नचारी । हम - खट्टर कका - ई अहाँ अतिशयोक्ति कऽ रहल छी। प्रसंगवश दू-एक ठाम कुच क वर्णन आवि गेल हेतैक । खट्टर कका बजलाह - तखन तों बानि दैत रहह । हम कुचकीर्तन सुना दैत छिऔह । देखह , कतहु सखी नायिका कै, शिक्षा दैत छथिन्ह - कतहु नायक कैं उपदेश दैत छथिन्ह - नायिका यौवनक भार सॅं अवग्रह में छथि । किऎक त - कतबो आँचर चौपेति कऽ रखै छथि , तथापि - तखन ओ हाथ लऽ कऽ झॅंपैत छथि । ई देखि नायकक चित्त चंचल भऽ जाइ छैन्ह - किऎक त - संयोगवश नायिकाक अंचल ससरि जाइ छैन्ह । ई देखि नायक कृतार्थ भऽ जाइ छथि - देखि कऽ मन में सिहन्ता होइ छैन्ह जे - सौभाग्यवश नायक कैं अनुकूल अवसर भेटि जाइ छैन्ह । जेना दरिद्र कैं स्वर्णकलश भेटि जाइन्ह तहिना नायक करय लगैत छथि - अन्त मे सफलता हाथ लगैत छैन्ह । तदुपरान्त - नायिका की करथु ? ओ आकुल भऽ गेलीह और नायक रसपान करय लगलाह । और आगाँ सुनबह ? हम – नहिं खट्टर कका । हम मानि लेल । परन्तु विद्यापति त राधाकृष्ण क भक्त छलाह तखन कुचकुंभ....... ख० - एतबे में तों उजबुजा गेलाह ? राधाक भक्त औरो दूर धरि पहुँचि जाइ छथिन्ह । देखह , हौ, तो भातिज नहिं रहितह त और बेसी सुनबितिऔह । किन्तु इहो संकोच त हमरा व्यर्थे भऽ रहल अछि । आब त एहन एहन पदावली विद्यार्थीक पाठ्य ग्रन्थ में राखल गेल छैन्ह !........कनेक रस्सी धराबह । हम रस्सी धरबैत कहलिऎन्ह - खट्टर कका, विद्यापति महादेवक परम भक्तछलाह । खट्टर कका व्यंग्य करैत बजलाह – हॅं, तेहन परम भक्त छलाह जे कामिनी क स्तनो में हुनका महादेव सुझैत छथिन्ह । देखह - परन्तु ओहन सुकमार महादेव कें भग्न होइत कतेक देरी लगतैन्ह ? हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, अहाँ त रसपक्षक धार बहा देलहुँ । परन्तु विद्यापति में भक्तिपक्षो त छैन्ह । महेशवानी सभ देखिऔन्ह । खट्टर कका रस्सी क घुरची छोड़बैत बजलाह – हौ, यैह त एहि देश में भेलैक अछि । कवि लोकनि कैं दुइएटा राग अबैत छैन्ह । यावत पर्यन्त भोग कर बाक शक्ति तावत् त मृगनैनी सुझैत छथिन्ह , और जहाँ थकलाह कि मृगछाला सूझय लागि जाइ छैन्ह । तैं युवावस्था भरि त - और वृद्धावस्था पहुँचल त - और वार्द्धक्य प्रयुक्त ओहि असमर्थता कैं नाम देल जाइ छैन्ह 'भक्ति' ! हमरा चुप्प देखि खट्टर कका बजलाह – ई कोनो विद्यापतिए में नहिं छैन्ह। देव विहारी मतिराम पद्माकर सभक यैह हाल छैन्ह । बूझह त एहि देशक परम्प रे यैह छैक । संस्कृत काव्य में दुइए टा धारा बहैत छैक । नवारी मे श्रृंगारकसरिता । बुढारी में वैराग्यक बाहा ! हम - खट्टर कका, एहि उपमा सॅं त बुझि पड़ैत अछि जे श्रृंगारे बेसी प्रबल अछि । ख० – ताहू में संदेहे ? संस्कृत काव्यक वाटिका में विचरण करबह तऽ नारंगी-अनार क सोभा देखैत रहि जैबह । हॅं, हत्ता पर वैराग्यक बबुर सेहो भेटतौह । हम – अहा ! ई त बड्ड सुन्दर उपमा भेल । ख० - हम यथार्थे कहैत छिऔह । बूझह त संस्कृत काव्य कुचकाव्य थीक। कवि लोकनि कैं संसारक समस्त गोल वस्तु ओहि में भेटैत छैन्ह । विद्यापति कि कोनो उपमा अपना घर सॅं लेलाह अछि ? तों ओहिना बानि देने जाह त हम संस्कृत -काव्य क चाशनी चखा दैत छिऔह । देखह, एक गोटा कहैत छथि - अर्थात् हे सुन्दरी ! अहाँक कुच पहिने जंबीरी नेबो कैं हरौलक, तखन स्वर्ण कलश कैं जितलक, और आब कनकाचल पहाड़ सॅं स्पर्धा कऽ रहल अछि हम - इह ! कवियोक उड़ान आश्चर्ये होइ छैन्ह । कलश सॅं कूदि कऽ एके बेर पर्वत पर पहुँचि गेलाह । ख० - दोसर गोटा कैं ओहू सॅं सन्तोष नहिं भेलैन्ह त एकदम आकाशे ठेका देलथिन्ह । अर्थात् ब्रह्मा आकाश बनौलन्हि से छोट भऽ गेलैन्ह । तखन फेर कऽ गढबाक हेतु साँचा बनौलन्हि, सैह अहाँक स्तन-मंडल थीक । हौ, एहन एहन कवि कैं सम्पूर्ण ब्रह्मांडे स्तनमंडल बुझि पड़ैत छैन्ह ! हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, अतिशयोक्तिक पराकाष्ठा भऽ गेल । खट्टर कका बजलाह - अतिशयोक्ति क त ई देशे थीक । एक रसिक कैं स्तनक ऊपर नखक चिन्ह देखि बुझि पड़ैत छैन्ह जे महादेवक ललाट पर चन्द्रमा विराजमान छथि । हम - धन्य छलाह ई कवि लोकनि ! ख० – तोरा एतबे में आश्चर्य होइ छौह । एकटा भक्तराज कैं दशो अवतार ओही में भेटि जाइत छैन्ह । कठोर, तैं कच्छप अवतार । कंदर्पक पताका फहर बैत, तैं मीनावतार । एवं प्रकारक तुलना करैत करैत कहै छथिन्ह जे` हम - हद भऽ गेल खट्टर कका ! एहन एहन उक्ति और कोनो भाषा मे भेटत ? ई लोकनि उमर खैयामो कैं जितलैन्हि । खट्टर कका बजलाह – हौ, खैयाम की खा कऽ ओहन कल्पना करताह ? देखह, एक गोटा कहै छथि - हौ, एतेक भोगासक्ति और कोनो देश में भेटतौह ? एहि ठामक कवि तन सॅं बेसी स्तन कैं बुझैत छथि । हम कहलिऎन्ह - परन्तु भक्तिओ त एहि देश में तेहने छैक । खट्टर कका बजलाह – हौ, भक्तिओ अधिकतर ताहि लऽ कऽ छैक । राधाक भक्त लोकनि केहन भक्ति करैत छथिन्ह से देखहुन । एक कवि कहैत छथिन्ह - ‘कृष्ण भगवान राधा सॅं छीनाछोरी करैत छथिन्ह जे हमर गेन दऽ दिअऽ ! हौ, राधाक पयोधर की भेलैन्ह , कवि लोकनिक खेलौना भऽ गेलैन्ह ! केओ गेन बना कऽ खेलाइ छथि । केओ बटखराक काज ओहि सॅं लैत छथि । हम - बटखराक काज ? से कोना ? ख० - देखह , एक कविक उक्ति छैन्ह - यशोदाजी कृष्ण सॅं पुछैत छथिन्ह जे अहाँ कतेक माखन लऽ गेलहुँ अछि ? ओहि ठाम कोनो पौआ वा अधसेरा त रहैन्ह नहिं । कृष्ण भगवान चट्ट दऽ राधाक स्तन धऽ कऽ देखा देलथिन्ह जे 'एतवा' । हमरा चकित देखि खट्टर कका बजलाह - देखह एक भक्त राधा कैं कहैत छथिन्ह - अर्थात हे राधे ! भगवान अनका भवसागर पार करबैत छथिन्ह, परन्तु जखन स्वयं मदन-सिन्धु में डूबय लगैत छथि, तखन अहीक पयोधररुपी कलश पकड़ि कऽ पार उतरैत छथि । हम क्षुब्ध होइत कहलिऎन्ह – बलिहारी एहन भक्त कैं । ओ भक्तराज अपने कोना पार उतरल हैताह ? ख० – देखह, दोसर भक्त कल्पना करैत छथि जे राधाक पयोधर देखैत-देखैत कृष्ण भगवान् गायक बदला बड़द दूहय लगलाह ! हम - खट्टर कका, अहाँ त तेहन-तेहन उदाहरण राखि दैत छी जे हमर मूँहे बंद भऽ जाइत अछि । ख० – हौ, कवि लोकनिक मन में जतबा गुबार छलैन्ह से सभटा राधा क नाम पर बाहर कैने छथि । सभ सॅं सस्त भेटलथिन्ह राधा । जेना ओ सभक भौजाइ होथिन्ह। और केवल राधा किऎक ? कवि लोकनि कैं त लाइसेंस भेटल छैन्ह । हुनका लेल जेहने राधा , तेहने लक्ष्मी , तेहने पार्वती । ओ ककरो छोड़यवला नहिं ! हम- अच्छा ! लक्ष्मीओ नहिं बाँचल छथि ? ख० - बॅंचतीह कोना ? देखह लक्ष्मी-नारायण क एक भक्त कोन प्र्कारे प्रार्थना करैत छथिन्ह ! विष्णु भगवान क चारु हाथ फॅंसल छैन्ह । एक हाथ लक्ष्मीक केश में, एक हाथ चिबुक में दू हाथ पयोधर में । आब कोंचाक बंधन कोन हाथे फोलताह ? पाँचम हाथ होइन्ह तखन ने ? एहन जे खेखनाएल भगवान से रक्षा करथु ! हम - खट्टर कका, एहन भक्त सॅं भगवाने रक्षा करथि । ख० - भगवान त भक्त सॅं हारले रहैत छथि । देखह, लक्ष्मीक एक भक्त कोना ध्यान करैत छथिन्ह ? अर्थात लक्ष्मीक कंचुकी में स्तन क लोभें विष्णुक हाथ सन्हिया रहल छैन्ह। से देखि कामदेव अपना प्रहरी सभ कैं जगा रहल छथि - “उठै जाह ! उठै जाह ! घर में चोर पैसि रहल छौह !” ऒ प्रहरी सभ तुरंत उठि कऽ ठाढ भऽ गेल । वैह ठाढ रोमावली हमरा सभक रक्षा करथु ! हम क्षुब्ध होइत कहलिऎन्ह - खट्टर कका, लक्ष्मीक भक्त लोकनि हद कऽ देने छथि । पार्वतीक भक्त एहि तरहें नहिं कहि सकैत छथिन्ह । खट्टर कका बजलाह - तखन सुनह । पार्वतीक भक्त, लक्ष्मीक भक्त सॅं एको डेग पाछाँ रहयबाला नहिं छथिन्ह । लोक चरण में प्रणाम करैत छैक, पार्वतीक एक भक्त स्तने में प्रणाम करैत छथिन्ह ! दोसर भक्त दूनू उन्मुक्त स्तनक जयजयकार करैत छथिन्ह । तेसर भक्तक दृष्टि में पार्वतीक स्तन शीशा जकाँ झलकैत छैन्ह ! पार्वतीक दूनू स्तन में महादेवक पाँचो मुँह अकित भेने पार्वती कैं दशमुख रावणक भ्रम भऽ जाइ छैन्ह जे ओ फेर कैलाश पर्वत उठाबय आयल अछि । एहि भय सॅं ओ शिवजी में लटपटा जाइ छथि । हम - इह ! हिनका लोकनिक कल्पना कहाँ सॅं पहुँचि जाइ छैन्ह ? ख० – तों एतबे में घबरा गेलाह ? देखह एक चारिम भक्त पार्वती कैं की कहैत छथिन्ह ? “हे जननी ! महादेवक क्रोधज्वाला सॅं जरैत कामदेव अहाँक नाभिरुपी सरोवर में आबि कुदलाह । ताहि सॅं जे धुआँ पसरल , सैह अहाँक रोमावली भऽ गेल ।" हम कान पर हाथ दैत कहलिऎन्ह - बाप रे बाप ! ‘जननी' सम्बोधन कय रोमावलीक वर्णन ! हमरा त रोमांच भय रहल अछि । ख० – तों एकटा सुनि कऽ घबड़ा गेलह ? हौ, सामान्य भक्तक बात जाय दैह । शंकराचार्य सन संन्यासी 'भवानीभुजंगस्त्रोत्र' में भवानी क रोमावली क स्तुति कैने छथिन्ह ! हौ, एहने भक्ति यदि केओ तोरा काकी सॅं करय लागि जाइन्ह , हुनका केहन लगतैन्ह ? हम - खट्टर कका, अहाँ त तेहन दृष्टान्त दैत छी जे हमर मुँहे बन्द भऽ जाइत अछि । भक्त लोकनि कोनो अंग त छोड़ि दितथिन्ह । ख० - तखन फेर भक्ते की कहबितथि ? खट्टर ककाक खाट लगिचा गेल छलैन्ह । बजलाह – देखह, रोमावली क वर्णन में एहि ठामक कवि कतबा बुद्धिक चमत्कार देखौने छथि ! एगोटा उत्प्रे क्षा करैत छथि - अर्थात् ई रोमावली की थीक जे कामदेव क दोआति सॅं रोसनाइ टघरि कऽ पसरि गेल अछि ! दोसर गोटा कैं ओहि में चुट्टीक पाँती सुझैत छैन्ह ! अर्थात् ई रोमावली नहिं थीक । ऊपर पयोधर देखि रसवृष्टि क अनुमान कय नाभि रूपी विवर सॅं चुट्टीक धारी चलल अछि ! तेसर गोटा कैं ओ लोह क सिक्कड़ बूझि पड़ैत छैन्ह ! नायिका कोमलांगी छथि । कटि प्रदेश अत्यन्त कृश छैन्ह । ऊपर पीन पयोधर क भार सॅं डाँड़ टुटि कऽ दू खंड नहिं भऽ जाइन्ह, तैं बीच में लोह क सिक्कड़ सॅं बान्हि देल गेल छैन्ह ! चारिम गोटा क ओ तीर्थस्थान बुझना जाइ छैन्ह ! अर्थात स्तन सॅं जे हार नीचा लटकल अछि से पर्वत सॅं निकसलि गंगा थीक और नीचा रोमावलीक रेखा यमुनाक धार थीक। जहाँ दूनूक संगम से तीर्थराज प्रयाग थीक । पाँचम गोटा कैं ओहि में तर्पणक तिल भेटि जाइत छैन्ह ! अर्थात कामदेवक तर्पणक हेतु जे तिल छिटल गेलैन्ह सैह रोमावली रूप में प्रकट अछि ! हौ, जतबा बुद्धिविलास ई लोकनि रोमावली में लगौने छथि ततबा दोसरा वस्तु में लगौने रहितथि त देशक बहुत उपकार होइत । हम - खट्टर कका, वास्तव में एहि ठाम क कवि प्रणम्य देवता होइ छथि । ख० – जौं से नहिं रहितथि त स्तोत्रो में रसिकता देखवितथि ? देखह, गौरीक ध्यान कोना होइ छैन्ह ! त्रिपुर-सुन्दरीक स्तुति देखहुन - आजन्म ब्रह्मचारिणी सरस्वती पर्यन्त कैं ई लोकनि नहिं छोड़लथिन्ह । और कहाँ धरि जे भगवतिओ क भजन करताह त - हौ, विना कुच कैं ई लोकनि ध्याने नहिं कय सकैत छथि ! हम - खट्टर कका, देवी लोकनि एहन भक्ति देखि कय मन मे की कहैत होइथिन्ह ? ख० – हौ, जाहिठाम सहोदरा क स्तन पर उत्प्रेक्षा कैल जाय जे - कुच-प्रत्यासत्या हृदयमपि ते चंडि कठिनम् ताहिठाम अन्यान्य देवीक कोन धाख ? हौ, बाबू ! तोरो सार कवि छथुन्ह ।कनेक बाँचिए कऽ रहिहऽ । खट्टर ककाक खाट तैयार भऽ गेल छलैन्ह । ओराँच कसैत बजलाह - असल में बूझह त कविक मूँह में लगाम नहिं होइ छैन्ह । हमरा त आश्चर्य होइ अछि जे लगाम कैं 'कविका' किऎक कहैत छैक । पुनः बजलाह - लेकिन हमरा त अपने मुँह में लगाम नहिं अछि । दोसरा कैं की दुसिऔक ? हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, भक्तिकाव्य में सेहो एतबा रसिकता छैक से हमरा नहिं बूझल छल । खट्टर कका बजलाह – हौ, भक्तिमार्ग खूब होइ अछि । हलुआ पूड़ी खाउ और रसकीर्तन करु - गोपी-पीन-पयोधर-मर्दन चंचल-कर-युग-शाली ! आन मार्ग में लोक सुखा जाइ अछि; भक्तिमार्ग में फूलि कऽ चतरा जाइ अछि । तैं त पुष्टिमार्ग कहल जाइ छैक । श्रृंगार ओ भक्ति में कि कोनो तात्विक अन्तर छैक ? जेना रस सॅं छलकैत अंगूर सुखा कऽ मोनक्का भऽ जाइत अछि, तहिना श्रृंगारो कालक्रमे भक्ति बनि जाइत अछि । "स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्य- भाषणम् " - सभ तरह क आनन्द एहू में भेटि जाइत छैक । कतेको भक्त तऽ चारि दिनक मासिको धर्म राखि कऽ भगवान कऽ प्रेयसीदल में सम्मिलित भऽ जाइ छथि । ```` परन्तु हमरा कोन काज जे सभ सॅं लड़ाइ-झगड़ा बेसाहने भेल फिरु ? जे होइ छैक से होबय दहौक ।` ` ` ` `` खैर, आइ तेहन चर्चा चलल जे ई खाट तैयार भऽ गेल । ई कहि खट्टर कका खाट उठा कऽ भीतर नेनेगेलाह । ॥ इति ॥
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हरिमोहन झा

मैथिलीक अद्वितीय हास्य-व्यंग्यकार ओ उपन्यासकार। 'कन्यादान', 'द्विरागमन' आ 'खट्टर काकाक तरंग' केर अमर रचयिता।

व्यक्तित्व ओ रचनावली ➔

⚖ अनुज्ञप्ति, स्रोत एवं प्रामाणिकता (License, Provenance & Quality)

अनुज्ञप्ति: PUBLIC_DOMAIN — सार्वजनिक डोमेन (पं. हरिमोहन झा केर अमर साहित्यिक कृति) • गुणवत्ता स्तर: समुदाय/परम्परा (Community/Heritage)

स्रोत विवरण / पाठ प्रामाणिकता: KhattarKaka.com / Samyak Foundation डिजिटल संग्रह। संकलन: खट्टर ककाक तरंग (अध्याय/कथा 24)। लेखक: पं. हरिमोहन झा।

मूल स्रोत (Original Source): https://khattarkaka.com/tarang/24

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