डाक-वचन, लोकोक्ति ओ मुहावरा
डाकक सहस्र-वर्षीय मौसम व कृषि विज्ञान, लोक-जीवनक तीक्ष्ण व्यंग्य, ओ पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित अमर मिथिला जीवन-दर्शन।
माघक घाम, जेठक छांह
माघ मासमे धूपक सेवन, जेठमे छायामे वास, बैसाखमे शीतल घरक आश्रय, आ साओनमे नियमपूर्वक स्नान स्वास्थ्य ओ दीर्घायुक रहस्य अछि।
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डाक के छलाह? (The Legacy of Dak in Mithila)
मिथिलाक प्राचीन परंपरा अनुसार डाक (Dak) एक प्रकांड दार्शनिक, खगोलविद, ओ कृषि-मौसम वैज्ञानिक छलाह। हुनक वचन (डक-वचन) कोनो कोरा कल्पना नहि, बल्कि सहस्र वर्षक सटीक पर्यावरणीय अवलोकन, नक्षत्र गति, वर्षा-अनुमान, पशुरक्षा, ओ मिट्टीक प्रकृतिक आधार पर रचित सूत्र अछि।
"साओन मास बहे पुरवैया...", "आद्रा बरसे पुनरबस जाय...", वा "माघक घाम, जेठक छांह..." जेहन वचन आजुक आधुनिक युगमे सेहो मिथिलाक गाम-घरमे सटीक सिद्ध होइत अछि। ई मंच एहि अनमोल मौखिक संपदाकेँ आधुनिक पीढ़ी लेल डिजिटल रूपमे संरक्षित करबाक संकल्प अछि।