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चतुर सियार आ बूढ़ बाघ

लेखक: पारंपरिक लोकवार्ता
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मिथिलाक एक सघन वनमे एक बूढ़ बाघ शिकार करबामे असमर्थ भऽ गेल छल। ओ इनार लग बैसकऽ हाथमे कुश लऽ कऽ साधुक भेष बना लेलक। जे कोनो जीव ओतय जाइ, ओकरा कहय— 'हम दानवीर भऽ गेल छी, ई स्वर्णक कंगन लियऽ।' एक सियार ओतय पहुँचल। सियार कंगन देखि लोभित नहि भेल। ओ दूरहि सँ पुछलक— 'हे व्याघ्र महाशय! अहाँक स्वभाव तँ हिंसक अछि, हम अहाँक विश्वास कोना करी?' बाघ कहलक— 'हम अहिंसक भऽ गेल छी, आउ पानि पी कऽ कंगन लऽ जाउ।' चतुर सियार हँसि कऽ कहलक— 'बाघक अहिंसा आ चोरक संन्यास केवल मूर्खक विनाशक कारण होइत अछि।' एतेक कहि सियार ओतय सँ फुर्ति सँ भागि गेल।
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पारंपरिक लोकवार्ता

मिथिलाक सदियों पुरान मौखिक परंपरा, दादी-नानीक कथा, संस्कार गीत आ जनस्मृति संकलित रूप।

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