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घासक फूल

लेखक: काशीकांत मिश्र 'मधुप'
(1955)
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हम उपेक्षित घासक फूल छी, मुदा हमरो प्राणमे सुगंध अछि। राजमहल नहि, हमर वास पथिकक चरणक पाँजमे आनंद अछि॥ नहि गुलाब जकाँ हमर अभिमान, नहि कमल जकाँ पूजाक आसन। मुदा माटिक सोहाग हमहूँ छी, प्रकृतिक अगाध रूपक शासन॥ बोर-प्रभात ओसक बूँद सँ, जब नहाय उठैत छी मुस्काइ। कहैत छी जीवनक सत्य यही, छोटेहुँमे अनंत समाइ॥
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काशीकांत मिश्र 'मधुप'

मैथिलीक मूर्धन्य कवि, गीतकार एवं महाकाव्यकार। 'राधा विरह' महाकाव्य लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ सम्मानित।

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