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जय जय भैरवि असुर भयावनि

लेखक: महाकवि विद्यापति
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जय जय भैरवि असुर भयावनि, पशुपति भामिनि माया। सहज सुमति वर दियहु गोसाउनि, अनुगत गति तुअ पाया॥ वासर रैन शवासन शोभित, चरण चंद्रमणि चूड़ा। कतयुक दैत्य मारि मुँह मेलल, कतयुक कयलक कूड़ा॥ सामर वरण नयन अनुरंजित, जलद जोग फुलकोका। कट कट विकट दशन तव दमकय, बिजुली चमकय लोका॥ घन घन घनन घुँघरू कत बाजय, हन हन कर तुअ काता। विद्यापति कवि तुअ पद सेवक, पुत्रक दुख हरु माता॥
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महाकवि विद्यापति

मैथिल कोकिल महाकवि विद्यापति मैथिली साहित्यक सर्वमान्य जनक, रससिद्ध कवि ओ दार्शनिक छलाह। हुनक पदावली विश्वप्रसिद्ध अछि।

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