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पत्रहीन नग्न गाछ

लेखक: वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' (नागार्जुन)
(1968)
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धूपमे ठाढ़, थर-थर काँपैत, पत्रहीन नग्न गाछ। माटिक सोझ गहिराईमे उतरल, संघर्षक साक्षी ठाढ़॥ जे सब पात छल, उड़ि गेल आँधीमे, डारि-पात सब टूटि बिलाएल। मुदा जड़ तँ अखनो जीवित अछि, नूतन कोंपलक आस जगाएल॥ ऋतु बदलिते फेर हरियर होयत, फुलि उठत संपूर्ण वनखंड। पत्रहीन गाछ कहैत अछि सोझे, हारि नहि मानब कहियो प्रचंड॥
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वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' (नागार्जुन)

मैथिलीमे 'यात्री' आ हिन्दीमे 'नागार्जुन' नाम सँ विख्यात। साहित्य अकादमी पुरस्कृत महाकवि, जनकवि ओ निर्भीक प्रगतिशील चिंतक।

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