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साहित्य (Literature)
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✓ मूल मैथिली
रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
पहिल दृश्य [स्थान: स्टेशनक प्लैटफार्म, एक प्रौढ़ा महिला सेकेंड क्लासक जनानी डब्बामे चढय चाहै छथि, ओम्हर रेलक भीतर सॅं एक नवयुवती दरवाजा छेकि कऽ ठाढि भऽ जाइ छथिन्ह, प्रौढाक पाछाँ कुली माँथ पर पेटी बिछौन नेने थक्कमक्क ठाढ अछि। तावत् घंटी पड़ि जाइ छैक। ]...
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✓ मूल मैथिली
रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
प्रथम दृश्य (मातृ वन्दना-पाँँच बालक द्वारा सम्मिलित गान) (आसावरी) द्वितीय दृश्य (पंडित अयाची मिश्र पूजापर बैसल छथि। आगाँँमे धूप, दीप, नैवेद्य, फूल, सराइ, पंचपात्र, अर्घी, घंटी आदि।) (बालक शंकरक प्रवेश) शंकर-बाबूजी, नवद्वीपसॅं एकटा विद्यार्थी आएल...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
रमेश बाबू, ओ कन्या साक्षात् लक्ष्मी थीक। देखबामे दुर्गाक मुर्त्ति, शील-स्वभावमे गंगा। भोजन कराबयमे अन्नपूर्णा। कहाँ धरि वर्णन करू? भोरे उठि फूल तोड़ैत अछि। गोसाउनि सीर निपैत अछि। अर्घी-सराइ मजैत अछि। स्नान कय भगवतीक पूजा करैत अछि। ई सभ कार्य...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
हमरा पुर्नियाँ जैबाक छल। परन्तु जे गाड़ी ७ बजे साँझमे कटिहार पहुँचबाक रहय से पहुँचल ९ बजे रातिमे। परिणाम ई जे कनेक्शन छूटि गेल। आब भोरमे ५ बजे गाड़ी भेटत। राति भरि एत्तहि स्टेशनमे रहय पड़त। अगत्या वेटिंग रूमक बाट धैलहुँ। कुली माथपर ट्रंक बिस्तर लऽ कऽ...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
आहि दिन पं० जीक चौपाड़िपर नोतिहारी सभ बैसल रहथि। बिझौ भऽ गेल रहैक, परन्तु भोजनमे किछु विलंब रहैक। ताही बीचमे पहुँचि गेलाह भोलबाबा। हुनका अबितहि सभ उल्लसित भऽ उठल जे आब गप्पक छुरुक्का उड़त। काशीनाथ कहलथिन्ह - आउ बाबा ! भल्लह बेर पर जुमलहुँ । एखन यैह...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
(१) प्रायः ३० वर्ष पहिनेक गप्प कहै छी। हम बहिनक सासुर गेल रही। हुनक ससुर धर्मशास्त्राचार्य। साठि-सत्तरसे कम नहि छल होइथिन्ह। हम जखन खैबा काल आङन जाइ त ओ पं० जी आगाँ-आगाँ खड़ाम खटखटबैत, खखसैत, आङनक मुँह परसॅं गर्द करथिन्ह- हे! पाहुन आबि रहल छथि।' यदि...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
ओहि दिन वर्षा झहरैत रहैक। हम क्लबमे बैसल चाह पिबैत रही। संगी सभ ताश-शतरंज खेलि कऽ अपन-अपन घर चलि गेल रहथि। एसकरमे समय काटब अब्बुह बूझि पड़ैत छल। तावत् देखैत छी जे मधुकरजी झटकल आबि रहल छथि। मधुकरजी रंगीन लोक। तेहन-तेहन गुलाबी गप्प छोड़ैत छथि जे सुननाहर...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
दृश्य १ [मंडन मिश्रक इनार । पनिसालाक दृश्य । एकटा तरुणी पनिभरनी लाल नूआ लहठी पहिरने पानि भरि रहल अछि । एकटा युवा संन्यासीक प्रवेश । कौपीन पहिरने, माथ मूँड़ल, एक हाथ मे यष्टि, दोसरा हाथ मे कमंडलु , पैर मे खड़ाम , ललाट पर भस्म-रेखा ।] सन्यासी (पनिभरनी...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
( १ ) दड़िभंगा १-१-१९ प्रियतमे, अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सय बेर पढ़लहुँ । तथापि तृप्ति नहि भेल । आचार्यक परिक्षा समीप अछि । किन्तु ग्रन्थ मे कनेको चित्त नहि लगैत अछि । सदिखन अहींक मोहिनी मुर्ति आँखि मे नचैत रहै अछि । राधा रानी ! मन होइ अछि जे अहाँक...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
भोलबाबा नोसि बनबैत रहथि । हमरा देखि पुछलन्हि - की हौ, कतय चललह अछि ? हम कहलिऎन्ह - अपनेक ओहिठाम किछु अलंकारक ज्ञान प्राप्त करय आएल छी । भोलबाबा एक क्षण गुम्म भऽ गेलाह । पुनः गम्भीरतापूर्वक बजलाह - तखन आङन चलह । हमरा थकमकाइत देखि कहलथिन्ह - एहि ठाम...
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