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साहित्य (Literature)
FOLK_TALE
🔄 अनुवाद प्रत्याशी (Hindi Source)
रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
"अरे वाह, पंडित जी ! बहुत शानदार बैल लिए जा रहे हैं ! कितने में मिला ?" गोनू झा अभी पशु मेले से निकले ही थे कि एक व्यक्ति ने उनसे पूछा । गोनू झा ने उस व्यक्ति की ओर देखा किन्तु उसे पहचान नहीं पाए। फिर भी अपने चेहरे पर औपचारिक मुस्कान लाकर बोले -"...
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#गोनू झा
#लोकगाथा
#हास्य-व्यंग्य
#चतुराई
#नीति-कथा
साहित्य (Literature)
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
मुंशी नौरंगीलालकें शुरूएसॅं जासूसी उपन्यास पढबाक शौक रहैन्ह। चन्द्रकान्ता, भूतनाथ, मायामहल, पढैत-पढैत हुनको जासूस सनक सवार भऽ गेलैन्ह। और संयोग एहन जे बी.ए. क तिलिस्म तोड़ला उत्तर काजो तेहने भेटि गेलैन्ह। नौरंगीलाल दरोगा भऽ गेलाह। दरौगा नौरंगीलालकें...
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#कथा
#हरिमोहन झा
#बीछल कथा
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
ओहि दिन जनताक कल्याणपर विचार करबाक हेतु एक उच्चस्तरीय समिति बैसल छ्ल। दूर-दूरसॅं सदस्यगण आयल छलाह। एक सज्जन बजलाह-सभ अनर्थक जड़ि थिक ई महगी। मुद्रास्फीतिक कारण वस्तुक दाम नित्य प्रति बढल जाइत अछि। जावत धरि ई मूल्यवृद्धि नहि रोकल जायत तावत लोकक कल्याण...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
-"हे औ पाहुन! देखू, फेर हमरा दस पड़ल। आब अहाँक गोटी कटा गेल।" -"ए तित्तिर दाइ! कन्ना नहि करू। अहाँकें दू खुदरा पड़ल अछि।" -"नहि! दस पड़ल अछि। एकटा कौड़ी चित्त छैक से नहि सुझै अछि?" -"नहि! दू टा कौड़ी चित्त छल। अहाँ कंगनासॅं घुसका देलिऎक ताहिसॅं एकटा पट...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
गाड़ी तीव्र गतिसॅं जा रहल छल। 'एयरकंडीशन' क तीन गद्दापर तीन जोड़ दंपति विराजमान छलाह-बंगाल, पंजाब आ केरलक, जेना त्रिभुजक तीन विंदु। रातुक साढे दस बाजि रहल छल। तीनू पति पढबामे तल्लीन छलाह। पत्नीलोकनि अपना-अपना टिफिन-केरियरसॅं भोजन निकालि कऽ परसि रहल...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
बहुत दिनपर परदेशसॅं चल अबैत रही। घरक हाल-चाल बुझना सात वर्ष भऽ गेल रहय। बुझितहुँ कोना? चिट्ठी-पत्री होइत तखन ने? परन्तु हम त रूसल रही। कहाँ-कहाँ घुमलहुँ रुपैयाक हेतु-जमदेशपुर, कलकत्ता, रंगून। और सात घाटक पानि पीबि आइ पुनः देश जा रहल छी। जहाँ नूनूकका...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
वैद्यनाथधामसॅं गाम अबैत रही। ओहि डिब्बामे एक बंगाली सज्जनक परिवार छलैन्ह। बंगाली बाबू, हुनक स्त्री, एक युवती कन्या तथा एक स्तनन्धय शिशु। ओ लोकनि एक सम्पूर्ण गद्दापर अपन एकाधिकार स्थापित कएने छलाह। ओहि बेंचपर और केओ आबि कए बैसए से हुनका लोकनिकें...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
भगीरथ बाबा जखन बूढ भऽ गेलाह त सातो बेटा उकछि गेलथिन्ह। एही बेटाक खातरि भगीरथ बाबा कामरु ढोयने रहथि, सालो-साल अजगैबीनाथसॅं गंगाजल बोझि बाबा बैद्यनाथपर ढारने रहथि। वरदान -स्वरूप एकटा के कहय, सात-सात पुत्र भेटलथिन्ह। भगीरथ बाबा गद्-गद् भऽ गेलाह। बड्ड...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
आइसॅं प्रायः बीस वर्ष पहिलुक बात कहैत छी। हम आइ. ए. मे पढैत रही और मुजफ्फरपुर मे ससुरक डेरामे रहैत रही। आब ससुर त नहि रहलाह परन्तु कालीबाड़ीक ओ मन्दिर औखन वर्तामान अछि। ओहि मन्दिरक चारूकात ओहि समय सघन जंगल रहैक। प्राकृतिक दृष्टिऍं ओ स्थान परम रमणीय।...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
ओहि दिन सन्ध्याकाल पोखरिक घाटपर लालधोतीक जमघट लागल रहय। गामक नवयुवकवृन्द, जनिक विवाह एहि शुद्धमे भेल छैन्ह, सासुरसॅं विदा भऽ कऽ आएल छथि। रसिक मित्रक गोष्ठी, नव उमंग, एकान्त स्थान, सन्ध्याक समय-एहन ठाम रसक गप्प नहि हो त हो कतय? ओहि मंडलीमे सभ केओ...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
हमर एक मित्र छथि शर्माजी । अमीर लोक कैं किछु ने किछु व्यसन रहिते छन्हि । हिनका नेचुरोपैथीक सनक छैन्ह । एक बेर हुनकर निमन्त्रण भेटल । ओ दुख छुटबाक उपलक्ष्य मे महाभोजक आयोजन कैने रहथि । हमरा देखितहि उल्लसित भऽ बजलाह - कहू, झाजी ! अहाँ कतय भोजन करब ?...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
एक बेर रेलमे जे मनोरंजन दृश्य देखलहुँ से अद्यावधि नहि बिसरल अछि। हम काशीसॅं पटना अबैत रही। सामने एक भारी भरकम पंडित बेस भड़कदार मुरेठा बन्हने बैसल छलाह। हुनका देखि एक गोटे कहलथिन-प्रणाम, नैयायिक जी! नैयायिक जी कहलथिन-अशुद्ध भेल। प्र उपसर्गपूर्वक नम्...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
अखबारमे बड़का-बड़का मोट हेडलाइनमे बहरायल -'कालाजार फेर आबि गेल।' चारू कात खलबली मचि गेल। कालाजारक उन्मूलन करबाक हेतु पचास करोड़क पंचवर्षीय योजना बनल छल। घोषणा कयल गेल छल जे "कालाजार सर्वदाक हेतु देशसॅं बिदा भऽ गेल। जे व्यक्ति कालाजारक समाचार देताह...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
खट्टर कका भांगक हेतु सौफ-मरीच बिछैत रहथि । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका ! पूजाक हॅंकार देने जाइ छी । ख०- कथी क पूजा ? हम - आइ हमरा ओहि ठाम सत्यदेव क पूजा छैन्ह । ख०- सत्ते ? हम - सत्य नहिं त फूसि ? हमरा मूॅंह तकैत देखि खट्टर कका बजलाह - परन्तु हौ जी,...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
गोनू झा का हास -परिहास और अपने कारनामों से लोगों को शिक्षा देने की प्रकृति केवल मिथिला नरेश के दरबार तक सीमित नहीं थी । वे अपनी कारगुजारियों से अपने सगे सम्बन्धियों और इष्ट -मित्रों को भी सबक देते रहते थे। एक बार उनकी चपेट में उनकी पत्नी भी आ गई ।...
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