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चारि मित्र आर बुद्धिक परीक्षा

लेखक: पारंपरिक लोकवार्ता
(1890)
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एक बेर मिथिलाक एक सुरम्य गाममे चारि मित्र रहैत छलाह। हुनक नाम छल— ज्ञानधर, शास्त्रधर, तर्कधर आर चौथाक नाम छल सुबुद्धि। पहिल तीनू मित्र काशी जा कऽ वेद, व्याकरण, न्याय आ दुर्लभ तांत्रिक शास्त्रक गहन अध्ययन कयने छलाह। ओ सभ मन्त्र-बल सँ निर्जीव वस्तुक पुनरुज्जीवन धरि विद्या जानैत छलाह। मुदा सुबुद्धि कोनो बड़का पोथी-पढुआ पण्डित नहि छल; ओकरा लग केवल एकटा अमूल्य सम्पत्ति छल— 'सहज व्यावहारिक बुद्धि' (Common Sense) आर समयक परख। एक दिन तीनू विद्वान मित्र आपसमे विचार कयलन्हि— 'हमरा सभक एहि अपार विद्याक की लाभ जँ देश-विदेश भ्रमण कऽ धनोपार्जन आर राजाक दरबारमे अपन प्रतिष्ठा सिद्ध नहि करी?' सुबुद्धि सेहो संग चलबाक आग्रह कयलक। पहिने तँ तीनू पण्डित हुनक उपहास उड़बैत कहलन्हि, 'अरे सुबुद्धि! तों तँ कोनो शास्त्र नहि पढलह, राजाक दरबारमे शास्त्रार्थ किना करबह?' मुदा बचपनक मित्रताक कारणेँ ओ सभ ओकरा संग लऽ लेलन्हि। चारू मित्र मार्गमे एक घोर अरण्य (जंगल) सँ गुजरि रहल छलाह। वनक मध्यमे ओ सभ एकटा अस्थि-पंजर (हड्डीक ढेर) देखलन्हि। ज्ञानधर गर्व सँ फूलि कऽ कहलक, 'आउ, आई हम अपन विद्याक प्रत्यक्ष चमत्कार देखबैत छी! हम अपन मन्त्र-बल सँ एहि बिखरल अस्थि सभकेँ उचित क्रममे सजा कऽ एक सम्पूर्ण कंकाल बना सकैत छी।' ओ मन्त्र पढलक, आर क्षण भरिमे अस्थि सभ परस्पर जुड़ि कऽ एक विशाल सिंहक ढाँचा बनि गेल। शास्त्रधर आगू बढ़ि कहलक, 'हमर विद्या एकरा सँ बढ़ि कऽ अछि। हम एहि अस्थि-पिंजर पर मांस, मज्जा, रक्त, चर्म आर बाल उत्पन्न कऽ सकैत छी।' ओ मन्त्र फूंकलक, तँ देखते-देखत एक सुप्तावस्थाक भयंकर बाघक शरीर प्रकट भऽ गेल। अब तर्कधर अट्टहास करैत कहलक, 'देह तँ बनि गेल, मुदा प्राणविहीन अछि। हम अपन प्राण-प्रतिष्ठा मन्त्र सँ एहिमे गर्जना करैत जीवन फूँकि देब!' ई देखि सुबुद्धि भयभीत भऽ गेल। ओ तर्कधरक हाथ पकड़ि कऽ रोकैत कहलक, 'हे मित्र! रुकू, अनर्थ जिनि करू! ई कोनो साधारण पशु नहि, एक खूंखार हिंसक बाघ अछि। जँ अहाँ एहिमे प्राण फूँकि देब, तँ ई जागिते हमरा सभकेँ फाड़ि कऽ खा जायत!' तर्कधर क्रोध सँ हुनक हाथ झटकैत कहलक, 'मूर्ख! तों हमर विद्याक यश देखि कऽ ईर्ष्या करैत छह? हम अपन जीवन-भरिक साधनाकेँ निष्फल नहि होबय देब। हम एहिमे प्राण फूँकि कऽ ही दम लेब!' सुबुद्धि बुझि गेल जे अहंकृत पाण्डित्य विवेकक बात नहि सुनैत अछि। ओ तुरन्त कहलक, 'ठीक अछि मित्र! जँ अहाँक अठह अछि, तँ मात्र एक क्षण ठहरि जाउ, हमरा एहि तरुक ऊपर चढ़ि जाय दिय।' सुबुद्धि झटपट निकटस्थ एक ऊँच वटवृक्षक डाल पर चढ़ि कऽ बैसि गेल। ओतय तर्कधर अपन चमत्कारी मन्त्रक उच्चारण कयलक। मन्त्र पूर्ण होइते बाघक आँखि रक्त-वर्ण भऽ धधकि उठल। ओ एक भीषण गर्जना कयलक आर उठिते अपन सोझाँ ठाढ़ तीनू पण्डित मित्र पर झपटि पड़ल। क्षण भरिमे तीनू अहंकारी मित्रक प्राण पखेरू उड़ि गेल। जब बाघ तृप्त भऽ कऽ गहिंर जंगल दिस चलि गेल, तँ सुबुद्धि गाछ सँ नीचाँ उतरल। ओ अश्रुपूर्ण नेत्रेँ अपन मित्र सभक अवशेष दिस ताकैत निःश्वास छोड़लक। मिथिलाक बुजुर्ग लोकनि आई धरि एहि कथाक माध्यम सँ ई नीति सिखाबैत छथि: 'वरं बुद्धिर्न सा विद्या विद्याया बुद्धिरुत्तमा। बुद्धिहीना विनश्यन्ति यथा ते सिंहकारकाः॥' अर्थात्, केवल शास्त्र-विद्याक अहंकार विनाशक कारण बनैत अछि; संकटमे सहज व्यावहारिक बुद्धि ही जीवनक रक्षा करैत अछि।
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पारंपरिक लोकवार्ता

मिथिलाक सदियों पुरान मौखिक परंपरा, दादी-नानीक कथा, संस्कार गीत आ जनस्मृति संकलित रूप।

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