STORY कथा PUBLIC_DOMAIN ✓ मूल मैथिली

खट्टर काकाक तरंग

लेखक: हरिमोहन झा
(1948)
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खट्टर काका अपन दालान पर गद्दा पर बैसकऽ पानक बीड़ा मुँहमे दैत कहलन्हि— 'हे बौआ! दुनियाक सब दर्शन एक दिस, आ मिथिलाक दही-चूड़ा एक दिस!' हम कहलियन्हि— 'काका, पाश्चात्य दार्शनिक कांट आ हेगेल जे कहने छथि, ओकरा विषयमे अहाँक की मत अछि?' काका जोर सँ हँसि उठलाह। कहलन्हि, 'अरे कांट-फांट की जनैत छल? ओ सभ कखनो मिथिलाक पाहुन भऽ कऽ माछ-भात खेलक छल? दार्शनिक ओहि केँ कहल जाइत अछि जे जीवनक कटु सत्यकेँ हँसैत-हँसैत पचाय लय। हमर मिथिलाक पूर्वज सभ जे बात कहि गेलाह, ओकरा बुझबाक क्षमता आई-काल्हिक पोथी-पढुआ सभमे कतय?' दालान पर बैसल समस्त गामक लोक ठहाका मारि उठल। खट्टर काकाक तर्कशास्त्रक आगू बड़-बड़ तर्कशास्त्री निरुत्तर भऽ जाइत छलाह। हुनक प्रत्येक हास्यक पाछाँ समाजक रूढ़िवाद पर तीक्ष्ण प्रहार रहैत छल।
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हरिमोहन झा

मैथिलीक अद्वितीय हास्य-व्यंग्यकार ओ उपन्यासकार। 'कन्यादान', 'द्विरागमन' आ 'खट्टर काकाक तरंग' केर अमर रचयिता।

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