STORY कथा PUBLIC_DOMAIN ✓ मूल मैथिली

मछरी

लेखक: राजकमल चौधरी
(1965)
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बाजार सँ रोहू मछरी लऽ कऽ जब बाबूजी घर पहुँचल छलाह, तँ पूरा आँगुरमे एकटा नव हलचल मचलि गेल छल। छोटका भाई नटवर बाल्टीमे भरल पानिमे जीवित मछरीक छटपटाहट देखि विस्मित छल। ओकर आँखिमे भय आ जिज्ञासाक विचित्र मेल छल। 'ई कियैक छटपटा रहल अछि बाबूजी?' नटवर पुछलक। 'पानि सँ बाहर अछि ने, ताहि लेल।' बाबूजी उत्तर देलन्हि। नटवर सोचय लागल— की हमरो सभक स्थिति समाजक एहि घुटनमे एहि मछरी जकाँ नहि अछि? राजकमल चौधरीक ई कथा मिथिलाक परंपरा आ आधुनिक अस्तित्ववादी संकट केर मर्मस्पर्शी साक्षात्कार करबैत अछि।
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राजकमल चौधरी

मैथिली आधुनिकतावादक विद्रोही कवि एवं कथाकार। 'मछरी', 'आंदोलन' आ 'स्वरगंधा' जनि रचना सँ मैथिली कथा जगतकेँ नवीन क्षितिज देलन्हि।

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