साहित्य (Literature)
NOVEL
✓ मूल मैथिली
रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास
भोलानाथ झा भोजन-छाजन क उपरान्त भाउजि कैं कहलन्हि- हमरा फेरि स्टेशन जाय पड़त । एहि ठाम क सभटा भार अही लोकनि क उपर रहल । ठकबा अछिए । जे किछु मॅंगाबक हो से मॅंगा लेब । झुनियाँमाय कैं बराबरि एत्तहि रहय कहबैक । देखब कोनो बात क विथुति नहि हो । बहुत पैघ लोक...
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रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास
मिस्टर सी० सी० मिश्रा पड़ल-पड़ल भावी पत्नी क रंग-विरंगी काल्पनिक चित्र खिचबा मे तन्मय भेल छलाह । एहि बीच मे रेवतीरमण पहुँचि कहल्थिन्ह - आपकी खातिर अन्दर से पान आया है, इसे ग्रहण कीजिए और जो सर्वेन्ट (नौकर) इसे लाया है, उसके लिए इसमे जो रिवार्ड (बखशीश)...
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रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास
- हॅ ऎ बहिना । यैह त कठिन भऽ गेलैक अछि। जहां वर भारी 'गिलास' मे अङ्ग्रेजी पढि जाइत छैक, तहां वर क बाप हजार सॅं नीचा पर गप्पे नहि करैत छैक। गरिबहा लोक एतेक कतय सं आनत। - ततबे धरि नहि । विवाह होइत देरी 'मोटर दियऽ, बाइसिकिल दियऽ, आगां पढ क लेल फीसदियऽ।...
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रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास
क्रमशः वर्षा थम्हि गेल। बिहाड़ियो बन्द भऽ गेल । आकाश निर्मल भऽ गेल। जखन भुरुकबा उगि गेलैक तखन बड़कागामवाली चुप्पहि उठि बूच्चीदाइक कोनट लागय ऎलथिन्ह । केबाड़ मे कान सटैलो उत्तर जखन किछु सुनाइ नहि पड़लैन्ह, तखन नहूँ-नहूँ केवाड़ ठोकैत कहलथिन्ह - की ऎ ! अहाँ...
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रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास
झारखंडीनाथ तार क अर्थ घोंखैत-घोंखैत गाम दिशि विदा भेलाह । एही धुन मे मस्त भेल बढल चल अबैत छलाह कि पाछां कनपट्टी लग घंटी टनटना उठलैन्ह । जहिना पाछाँ फिरि कऽ ताकय लगलाह कि नीचा साइकिल कऽ अगिला पहिया सरसराइत साँची धोती क मध्यभाग मे सन्हिया गेलैन्ह ।...
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रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास
जखन सभागाछी पहुँचबा सॅं आध कोस बाँकी रहि गेलैन्ह तखन घुटर झा कैं बाह्यभूमि दिशि जैबाक शंका बूझि पड़लैन्ह । अपन नसिदानी क बटुआ भोलानाथ झा क हाथ मे दैत कहलथिन्ह 'हौ बाबू ! तोरा लोकनि आगाँ बड़ क गाछ तर बैसै जैहऽ । हम एहि पोखरि सॅं भेने अबैत छी ।'ई कहि...
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रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास
घोर अन्धकार व्याप्त भय रहल अछि। आकाश मे समुद्र क लहरि जकाँ चारू कात सॅं कारी-कारी मेघ उमड़ रहल अछि। बीच-बीच मे बिजली चमकि उठैत अछि। थोड़बहि काल मे टिप-टिप कय पानि पड़य लागल। ई घटाटोप देखि जे गाइन लोकनि सौजन्य क सॅंचार देखय और उचिती गाबक हेतु आइलि छलीह...
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रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास
मण्डप पर बैसितहि मिस्टर सी० सी० मिश्रक नेत्र सभ सॅं पहिने ओहि सुपरिचित गुलाबी साड़ी क अन्वेषण मे इतस्ततः घूमय लागल। ई देखि पं० नमोनाथ झा बजलाह- ट ट ट ट टी टी टी टी टीक टीक टीक बान्हि लेल जाओ। एतबहि में मिश्रजी देखैत छथि जे स्त्रीगण क झुण्ड ओहि गुलाबी...
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रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास
-काग की दोस? -काग। -फक्का मुट्ठी बारह। आब लाबह बारहटा अंडी। -से त नहि होएतौह, हे सरौता! एतेक कन्ना नहि करह। एतबहि मे ढुनमुनकाकी ओहि ठाम पहुँचि गेलीह और बुच्ची दाई कैं फुलमतिया क संग काग-दोस खेलाइत देखि कहय लगलथिन्ह देखू त भला ई अकड़हड़! आइ हिनकर वर चल...
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रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास
गाड़ी छुटि गेला उत्तर बुचकुन चौधरी जाड़ तथा क्रोध क वेग सॅं थरथर काँपय लगलाह । गंगाजी क प्रति जे भक्ति छलैन्ह से विरक्ति क रूप मे परिणत भय गेलैन्ह । डाड़ मे अङ्गपोछा लपेटि भीजल धोती गाड़ैत-गाड़ैत बाजय लगलाह - आब कलियुग क गंगा मे कोनो टा महत्व नहि रहल ।...
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फैसला सुनबा क समय यावत मुद्दालह लोकनि कठघरा मे ठाढ़रहैत छथि, तावत पर्यन्त हुनका लोकनि क सौसे देह भुलकैत रहैत छैन्ह । किन्तु हाकिम क मुँह सॅं रिहाइ क आज्ञा सुनैत देरी हुनका लोकनि कैं कत गोट मोक्षानन्द क प्राप्ति होइत छैन्ह, से केवल भुक्तभोगिए अनुभव कय...
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संध्या क समय अछि । सूर्य भगवान रुसल जमाय जकाँ मुँह विधुऔने प्रस्थान कय रहल छथि । गङ्गाजी क हिलकोर देखि भान होइछ जेना जमाय क रुसला सॅं गोटेक छोहगरि सासु क छाती दलमलित भय रहल हो। एतबहि मे एकटा स्टीमर शंखनाद करैत महेन्द्रू घाट दिशि अबैत दृष्टि गोचर...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
मिथिलाक ग्रामीण जीवनमे अंग्रेजी पढ़ल नवयुवकक विवाह आर परंपराक बीच द्वंद्वक सजीव चित्रण...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
सरस्वती दाइ अत्यन्त संस्कारिणी ओ चमत्कारिणी छलीह । दुर्गा ओ गीता पाठ करयवाली । बजबाक चमत्कार तेहन जे अरिकोंच कैं 'अरिकंचन' कहैत छलीह, बॅंसबाड़ि 'वंशवाइरि' । परन्तु भगवानो त विचित्र कौतुकी छथि । हुनक विवाह भेलैन्ह भदेशक मौजे लाल झा सॅं जे निट्ठाह...
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(१) प्रायः ३० वर्ष पहिनेक गप्प कहै छी। हम बहिनक सासुर गेल रही। हुनक ससुर धर्मशास्त्राचार्य। साठि-सत्तरसे कम नहि छल होइथिन्ह। हम जखन खैबा काल आङन जाइ त ओ पं० जी आगाँ-आगाँ खड़ाम खटखटबैत, खखसैत, आङनक मुँह परसॅं गर्द करथिन्ह- हे! पाहुन आबि रहल छथि।' यदि...
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