मछरी
✍ राजकमल चौधरी (1965)
बाजार सँ अनल गेल मछरी आ गामक पारिवारिक संवेदना केर आधुनिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण...
विद्यापति केर अमर पद सँ लऽ कऽ आधुनिक कथा, कविता, लोकगाथा आ बाल-साहित्य केर प्रामाणिक डिजिटल संग्रह।
✍ राजकमल चौधरी (1965)
बाजार सँ अनल गेल मछरी आ गामक पारिवारिक संवेदना केर आधुनिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण...
✍ हरिमोहन झा (1933)
मिथिलाक ग्रामीण जीवनमे अंग्रेजी पढ़ल नवयुवकक विवाह आर परंपराक बीच द्वंद्वक सजीव चित्रण...
✍ हरिमोहन झा (1948)
खट्टर काका अपन दालान पर गद्दा पर बैसकऽ पानक बीड़ा मुँहमे दैत कहलन्हि— 'हे बौआ! दुनियाक सब दर्शन एक दिस, आ मिथिलाक दही-चूड़ा एक दिस!'
✍ काशीकांत मिश्र 'मधुप' (1955)
हम उपेक्षित घासक फूल छी, मुदा हमरो प्राणमे सुगंध अछि। राजमहल नहि, हमर वास पथिकक चरणक पाँजमे अछि...
✍ वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' (नागार्जुन) (1968)
धूपमे ठाढ़, थर-थर काँपैत, पत्रहीन नग्न गाछ। माटिक सोझ गहिराईमे उतरल, संघर्षक साक्षी ठाढ़...
✍ कविशेखर चन्दा झा (1886)
सीतापति पद पंकज वंदि, सुरसरि सम पावन मति चंदि। मैथिल जनहित रामायण कह, भाषा सरल मधुर रस बह॥
✍ महाकवि विद्यापति (1425)
बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे। छोड़इत निकट नयन बह नीरे॥ करजोड़ि विनमओ विमल तरंगे...
✍ महाकवि विद्यापति (1410)
जय जय भैरवि असुर भयावनि, पशुपति भामिनि माया। सहज सुमति वर दियहु गोसाउनि, अनुगत गति तुअ पाया॥